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रायपुर के चर्चित 2013 गोलीकांड में बड़ा फैसला, वीरेंद्र सिंह तोमर को मिली बड़ी राहत

न्यायाधीश नीरज शर्मा की अदालत ने आरोपी वीरेंद्र सिंह उर्फ रुबी सिंह को सभी आरोपों से बरी कर दिया है

**📰 द नारद न्यूज 24 | विशेष रिपोर्ट**

**रायपुर के चर्चित 2013 गोलीकांड में बड़ा फैसला, वीरेंद्र सिंह तोमर सभी आरोपों से बरी**

**रायपुर।** राजधानी के टिकरापारा थाना क्षेत्र स्थित चौरसिया कॉलोनी में वर्ष 2013 में हुए बहुचर्चित गोलीकांड मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश **नीरज शर्मा** की अदालत ने आरोपी **वीरेंद्र सिंह उर्फ रुबी सिंह** को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

**कोर्ट का फैसला: सबूत नहीं कर सके साबित**

अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस एवं पुख्ता साक्ष्यों के आधार पर साबित करने में असफल रहा। गवाहों के बयान और प्रस्तुत किए गए प्रमाण न्यायालय में टिक नहीं पाए, जिसके चलते आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया गया।

**क्या था पूरा मामला?**

जानकारी के अनुसार, फर्नीचर व्यवसायी **मोहम्मद हबीब खान** को वीरेंद्र सिंह द्वारा अपनी बहन की शादी के लिए करीब **48 हजार रुपये** का फर्नीचर तैयार करने का ऑर्डर दिया गया था। इसमें **5 हजार रुपये एडवांस** दिए गए थे, जबकि शेष राशि बाकी थी।

 

फर्नीचर देने के बाद भुगतान नहीं होने पर दोनों पक्षों के बीच विवाद शुरू हो गया।

 

**विवाद में चली गोली, एक की मौत**

**13 अगस्त 2013** को हबीब खान अपने साथियों के साथ फर्नीचर वापस लेने वीरेंद्र सिंह के घर पहुंचे। इसी दौरान विवाद बढ़ गया और मारपीट की स्थिति बन गई।अभियोजन के मुताबिक, वीरेंद्र सिंह ने पिस्टल से हबीब खान पर फायर किया, लेकिन गोली उन्हें नहीं लगी। वहीं पीछे खड़े **नौसाद आलम उर्फ असलम** को गोली लग गई, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

 

**जांच और ट्रायल**

घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। मौके से साक्ष्य जुटाए गए, गवाहों के बयान लिए गए और आरोपी के पास से पिस्टल भी बरामद की गई। हथियार को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया और सभी प्रक्रियाओं के बाद मामला अदालत में प्रस्तुत किया गया।

**बचाव पक्ष की दलील**

आरोपी की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता **सुनील ओटवानी** एवं अधिवक्ता **शशांक मिश्रा** ने बताया कि केस में प्रस्तुत साक्ष्य कमजोर थे और अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर पाया।

**निष्कर्ष**

करीब एक दशक पुराने इस चर्चित मामले में अदालत के फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायालय में केवल आरोप नहीं, बल्कि मजबूत और ठोस साक्ष्य ही निर्णायक भूमिका निभाते हैं।📌

**(द नारद न्यूज 24)**

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