ज़िन्दगी का आनंद अपने तरीके से ही लेना चाहिएज़िन्दगी का आनंद अपने तरीके से ही लेना चाहिए, लोगों की खुशी के चक्कर में तो शेर को भी सर्कस में नाचना पड़ता है।
साधक का कर्तव्य है कि वह गुण और दोष का दर्शन राग और द्वेष के लिए न करे,बल्कि अपने जीवन में गुणों का संग्रह और दोषों का त्याग करने के लिए करे।

The narad news 24 ,,,, धार्मिक ,,,,पुराणों में एक विलक्षण संकेत प्राप्त होता है कि भक्त और भगवान् दोनों को एक ही प्रकार की परीक्षा देनी पड़ती है। जैसे भक्त पर लात का प्रहार किया गया वैसे ही भगवान् पर भी। अन्तर इतना है कि दोनों स्थानों पर मारने वाले पात्र अलग-अलग स्तर के हैं। पुराणों में कथा आती हैं कि भगवान् नारायण की छाती पर भृगु महोदय ने प्रहार किया । और इधर विभीषण की छाती पर रावण प्रहार करता है।
भृगु परम पुण्यात्मा हैं और रावण पापी हैं। परीक्षा के पात्र हैं भक्त और भगवान्। भगवान् की परीक्षा के सन्दर्भ में कथा यह है कि एक बार इस बात पर विवाद छिड़ा कि भगवान् के अनेक रूपों में सर्वश्रेष्ठ रूप कौन है ? भृगु को परीक्षा का भार सौंपा गया। वे ब्रह्मा के पास पहुँचे पर उन्हें प्रणाम नहीं किया। इससे ब्रह्मा को बुरा लगा। भृगु सोचने लगे कि ये बड़े शक्तिशाली और सृष्टि के रचयिता तो हैं, पर सम्मान के प्रेमी हैं ; यह इनकी कमी है, इसलिए ये श्रेष्ठ नहीं हैं। फिर वे भगवान् शंकर के पास पहुँचे। उन्हें देखते ही शंकरजी दौड़कर उनसे मिलने के लिए आए। पर भृगु कह उठे — तुम तो चिता की राख लगाए रहते हो, बड़े गन्दे हो, मुझे मत छुओ। यह सुनकर शंकरजी त्रिशूल लेकर उन्हें मारने दौड़े। भृगु ने सोचा कि अरे, ये तो महान् क्रोधी हैं — अभी इतना प्रेम दिखा रहे थे और अब मारने दौड़ रहे हैं ; नहीं, ये भी श्रेष्ठ नहीं। तत्पश्चात् वे विष्णु भगवान् के पास क्षीरसागर गए। भगवान् नारायण शयन कर रहे थे और कहा जाता है कि भृगु ने उनकी छाती पर चरण से प्रहार किया। भगवान् उठकर बैठ गए और उन्होंने भृगु के चरण को पकड़ लिया। कहा — महाराज, आपके चरणों को बड़ा कष्ट हुआ होगा, क्योंकि वे तो बड़े कोमल हैं, जबकि मेरा हृदय बड़ा कठोर है। जब भृगु लौटकर आए, तो उन्होंने घोषणा कर दी कि नारायण ही भगवान् का सर्वश्रेष्ठ रूप है।
पुराणों की यह कथा आप लोगों ने सुनी होगी, पर अन्तरंग में पैठकर तो देखिए कि इसका तत्त्व क्या हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि भृगु ने ब्रह्मा या शंकरजी को जो प्रमाणपत्र दिया, वह सही था। उनके प्रमाणपत्र का कोई बहुत मूल्य नहीं था। वे यदि प्रमाणपत्र न भी देते, तो नारायण की भगवत्ता में कोई अन्तर न आता। यह तो उनकी अपनी कसौटी थी। जैसे कोई पहली कक्षा का विद्यार्थी किसी को एम. ए. का प्रमाणपत्र दे दे, तो उसका क्या मूल्य ? उसके प्रमाणपत्र देने या न देने का कोई अर्थ नहीं। तब फिर यह जो भृगु ने भगवान् नारायण की परीक्षा ली, उसका क्या तत्त्व है ? वास्तव में जब भगवान् ने उनसे कहा कि आपके चरणों में चोट लग गई होगी, तो इसमें स्तुति और व्यंग्य दोनों हैं। वह कैसे ? भृगु ब्राह्मण हैं , अकिञ्चन हैं। एक नया दृश्य उपस्थित होता है। ऐसा तो देखा जाता है कि एक अकिञ्चन किसी लक्ष्मीपति के पास जाकर अपमानित या लाञ्छित हो, पर ऐसा बहुधा नहीं देखा जाता कि अकिञ्चन जाकर लक्ष्मीपति का ही अपमान कर दे। और अपमान भी कैसा किया ? हृदय पर चरण से प्रहार किया। लक्ष्मीजी ने जब प्रश्न सूचक दृष्टि से मुनि की ओर देखा, तो मुनि बोले — ये सो रहे हैं इसलिए इन्हें जगा रहे हैं ! तो क्या भगवान् सो रहे थे ? उनका तो शयन भी जागरण ही है। फिर भृगु किनको जगाने चले थे ? 
इस प्रसंग का एक सांकेतिक अर्थ है। भृगु हैं त्यागी, तपस्वी और भगवान् हैं लक्ष्मीपति। जैसे भृगु में त्याग का अहंकार था, उसी प्रकार सर्वशक्तिमान् भगवान् में भी अपने लक्ष्मी पतित्व का अभिमान यदि जाग उठता, तब क्या होता ? संसार में ऐसे अहंकारों की टकराहट प्राय: ही दिखाई देती है। एक व्यक्ति को त्याग का अहंकार है कि मैंने इतना छोड़ दिया, तो दूसरे को संग्रह का अहंकार है कि मेरे पास इतना धन है। ये दोनों अहंकार एक-दूसरे से भिड़ते रहते हैं। पर यहाँ पर भृगु तो अपने त्याग का अहंकार लेकर आए लेकिन लक्ष्मीपति इतने निरहंकारी निकले कि त्यागी हार गए ! लक्ष्मीपति शरीर से तो जागे, पर उनका अहंकार नहीं जग पाया। और व्यंग्य यह था कि प्रभु पूछ बैठते हैं — महाराज, आपको चोट तो नहीं लगी ? भृगु आए थे भगवान् को चोट पहुँचाने। यदि भगवान् का अहम् जागता कि कहाँ मैं साक्षात् भगवान, लक्ष्मीपति और कहाँ यह अकिञ्चन ब्राह्मण, और इसकी धृष्टता तो देखो कि मुझ पर प्रहार कर रहा है — तब तो भगवान् को अवश्य चोट लग जाती। पर भगवान् का अहम् नहीं जगा, इसलिए उनकी विजय हो गई और त्यागी पराजित हो गया। यदि कभी ऐसा हो कि प्रहार करने वाला जिस पर प्रहार करे उसे तो चोट न लगे और स्वयं प्रहार करने वाले को ही चोट लग जाए, तो इससे बड़ा कोई अचरज नहीं हो सकता। यहाँ पर ऐसा ही हुआ। अभिप्राय यह है कि सही अर्थों में व्यक्ति को चोट तब लगती है, जब वह अपने ‘मैं’ पर, अपने अहम् पर प्रहार का अनुभव कर तिलमिला जाता है। भगवान् नारायण में तो रंचमात्र भी अहंकार नहीं है, इसीलिए वे जगद् वन्द्य हैं, जगत्पूज्य हैं। तभी तो वे मुस्कराकर मुनि से पूछते हैं कि चोट तो नहीं लगी ? और भृगु को अपनी भूल का ज्ञान होता है। वे लौट आते हैं। भगवान परीक्षा में खरे उतरते हैं। और आज तो भक्त की परीक्षा है। विभीषण की सारी साधना, उनका पुण्य उनका धर्म आज कसौटी पर है। रावण उन पर चरण-प्रहार करता है। यह कोई नई बात नहीं थी, क्योंकि संसार में प्रहार किसको नहीं झेलना पड़ता ? जीवन में कौन अपमानित नहीं होता ? भगवान् पर भी जो प्रहार हुआ, वह भी कोई नई बात नहीं थी। इस जगत् में ऐसा कोई नहीं, जो किसी से ठुकराया न जाए। पर यह सब होते हुए भी भक्त और भगवान् की दृष्टि का भेद है। घटनाओं का भेद नहीं है, घटनाएँ तो समान दिखाई दे रही हैं। हमारी सच्ची परीक्षा घटनाओं के परिवर्तन में नहीं है, बल्कि इसमें है कि हम घटनाओं से क्या लेते हैं और सीखते हैं। हमारी सच्ची परीक्षा दृष्टि के परिवर्तन में है कि हम किस दृष्टि से घटनाओं को देखते हैं। आप थोड़ा विचार करके देखें, विभीषण पर जो चरण-प्रहार हुआ, क्या वैसा अपमान सभाओं में बहुत-से लोगों का नहीं होता ?
मैंने कहीं यह पढ़ा था-एक बार तुलसी जयन्ती के अवसर पर एक कवयित्रीजी ने एक बड़ी सुन्दर कविता सुनाई और यह कहा कि लोग तुलसीदासजी की जय बोलते हैं, पर मैं तो रत्नावलीजी की जय बोलूँगी, जिन्होंने कठोर व्यंग्य करके, डांटकर तुलसीदासजी को सन्त बना दिया !
मेरे विचार से — अगर तुलसीदासजी पत्नी की डाँट से सन्त बनते। तब तो घर-घर तुलसीदास पैदा हो जाते ! हजारों-लाखों लोग तो डाँट सहते रहते हैं, पर क्या वे सब तुलसीदास बन जाते हैं ? अरे, क्या कोई डाँट या प्रहार से तुलसीदास या विभीषण बन जाता है ? लोग तो बड़े सहनशील होते हैं, वे तो बड़े-बड़े चरण-प्रहार झेल लेते हैं। उनका लाख अपमान हो, उन पर लाख प्रहार हों, पर वे अडिग रहते हैं, मानो गीता के समत्व में स्थित हों ! यह क्या कोई स्पृहणीय (वांछनीय ) स्थिति है ? सच्चा समत्व तो साध्य की स्थिति है। साधक के जीवन में यह समत्व भला कहाँ से आ सकता है ? साध्य को स्थिति में बिना पहुँचे यदि किसी के जीवन में समत्व-सा दिखाई दे, तो वह ज्ञानजन्य नहीं बल्कि कायरता और अज्ञानजन्य होगा। गोस्वामीजी एक अनोखा संकेत देते हैं। वे कहते हैं —
आठवँँ जपालाभ संतोषा।
सपनेहूँ नहिं देखइ परदोषा।।
स्वप्न में भी दूसरों का दोष नहीं देखना चाहिए। और इधर ‘मानस’ के प्रारम्भ में वे सन्त और असन्त के लक्षण लिखते हैं। किसी ने उनसे कहा — महाराज, एक ओर तो आप शिक्षा देते हैं कि दूसरों का दोष नहीं देखना चाहिए और दूसरी ओर आप स्वयं असन्तों के दोष गिना रहे हैं। हमें तो लगता है कि दोष देखने में भी आपकी दृष्टि बड़ी पैनी है। या तो आपको लिखना था कि दोष मत देखो, या फिर आप लिखते कि दोष देखो। आप स्वयं के दोष देखें और दूसरे से कहें कि दोष न देखना भक्त का लक्षण है, यह विरोधाभास है। गोस्वामीजी इसका सार्थक उत्तर देते हैं, कहते हैं — नहीं भाई, दोष और गुण अवश्य देखना चाहिए। दोष-गुण का अभाव साध्य की स्थिति में होता है, पर यदि साधक के जीवन में गुण और दोष का दर्शन न होगा, तो अनर्थ हो जाएगा। पर हाँ, यह सीख लेना चाहिए कि गुण और दोष कैसे देखें। बहुधा जब हम गुण देखते हैं, तो गुण के प्रति हमारी आसक्ति न हो गुणी के प्रति हो जाती है और इससे गुण हमारे बन्धन का कारण बन जाता है। उसी प्रकार जब हम दोष देखते हैं, तो दोष से घृणा न कर दोषी से करने लगते हैं, जिससे दोष हमारे अन्त:करण में और भी गहरे पैठ जाता है। ऐसी स्थिति में साधक क्या करे ? वह दोष और गुण को किस प्रकार देखे ? गोस्वामीजी कहते हैं कि वह दोष और गुण को इस प्रकार देखे, जिससे वह दोष को पहचानकर उसका त्याग कर सके और गुण को समझकर ग्रहण कर सके। वे लिखते हैं —
तेहि तें कछु गुन दोष लखाने।
संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने।।
अत: साधक का कर्तव्य है कि वह गुण और दोष का दर्शन राग और द्वेष के लिए न करे, बल्कि अपने जीवन में गुणों का संग्रह और दोषों का त्याग करने के लिए करे। विभीषणजी की दृष्टि ऐसी ही थी। इसलिए रावण के चरण-प्रहार में भी प्रभु का ही संकेत देख सके। उन्हें अपने दोष का ज्ञान हुआ और वे उसके त्याग में व्रती हुए।

जय श्री राम।


