टेक्नोलॉजी

Dead Birds turned Drones: मर चुके परिंदे बनेंगे ड्रोन! जासूसी के लिए वैज्ञानिकों की नेक्‍स्‍ट लेवल की तैयारी, गुब्‍बारे से आगे की बात

पिछले कुछ दिनों में दुनिया ने ‘जासूसी’ की कई बातें सुनी हैं। इसने दो महाशक्तियों अमेरिका और चीन को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। हालांकि, जासूसी के लिए अब ‘गुब्‍बारे’ से आगे की बात चल पड़ी है। इसमें मर चुके परिंदों का इस्‍तेमाल होगा। इन्‍हें ड्रोन बनाया जाएगा। पंख फड़फड़ाने वाले ड्रोन से इंसानों और जानवरों की जासूसी की जाएगी

नई दिल्‍ली: बीते कुछ दिनों में ‘जासूसी’ शब्‍द से लोगों का कई बार पाला पड़ा है। यह अंतरराष्‍ट्रीय मुद्दा बना हुआ है। इसने दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों अमेरिका और चीन को आमने-सामने ला दिया है। चीनी जासूसी गुब्‍बारों को नेस्‍तनाबूद करने की अमेरिकी कार्रवाई से ड्रैगन बिलबिलाया हुआ है। अमेरिका ने जहां गुब्‍बारों को जासूसी का हथियार बताया है तो चीन का वर्जन अलग है। उसने कहा है कि इन गुब्‍बारों को मौसम की जानकारी लेने के लिए भेजा गया था जो रास्‍ता भटक गए। चीन कितना सच बोल रहा है, यह कहना तो मुश्किल है। लेकिन, आने वाले समय में जासूसी पर दुनिया तगड़ा पैसा खर्च करने वाली है। जासूसी के नेक्‍स्‍ट लेवल पर जाने की तैयारी शुरू हो गई है। इसके लिए मर चुके परिंदों को ड्रोन बनाया जाएगा। आपके मन में जरूर यह सवाल उठ रहा होगा कि आखिर ये होगा कैसे? यह और बात है कि वैज्ञानिकों के पास इसका जवाब मौजूद है।वैज्ञान‍िक ड्रोन बनाने के लिए मर चुके परिंदों की चमड़ी का इस्‍तेमाल करेंगे। यानी ड्रोन को परिंदों की शक्‍ल दे दी जाएगी। यह परिंदा जब आपके घर की छत या खिड़की पर बैठेगा तो आप जान भी नहीं पाएंगे कि कोई जासूसी कर रहा है। इस प्रोजेक्‍ट में बड़े-बड़े वैज्ञानिक शामिल हैं। प्रोजेक्‍ट से जुड़े एक इंजीनियर ने बताया कि ड्रोन असल में रिमोट से कंट्रोल होने वाले मिनी-एयरक्राफ्ट होते हैं। इन्‍हें इंसानों और जानवरों पर नजर रखने के लिए दूर से इस्‍तेमाल किया जा सकता है।बायोमिमिक्री तकनीक का इस्‍तेमाल
प्रोजेक्‍ट पर काम करने वाले दो इंजीनियर डॉ मुस्‍तफा हसनालियन और अमीयर ने बताया कि प्रवासी पक्षी ऊर्जा कैसे बचाते हैं, इसका अध्ययन करने के लिए ड्रोन कुशल तरीका बन सकता है। वे ड्रोन बनाने के लिए बायोमिमिक्री नाम की तकनीक का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। इसका बुनियादी मतलब है कि डिजाइन और उत्पादन उन चीजों पर आधारित है जो दुनिया में पहले से मौजूद हैं।न्यू मैक्सिको टेक में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ मुस्तफा हसनालियन ने कहा कि ड्रोन बनाने के लिए नकली सामग्री के बजाय हम मर चुके परिंदों का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। उन्हें ड्रोन के रूप में री-इंजीनियर किया जा सकता है।र‍िसर्च में क‍िन चीजों पर है फोकस?
मुस्‍तफा ने बताया कि कभी-कभी प्रकृति को देखने से हमें अलग-अलग तरह की इंजीनियरिंग सिस्‍टम्‍स के बारे में पता चलता है। इनके जरिये डेवलपमेंट और ऑप्‍टमाइजेशन के लिए सबसे अच्‍छा जवाब मिलता है। अभी तक ‘डेड बर्ड ड्रोन’ सिर्फ प्रोटोटाइप हैं। निकट भविष्य में वे जंगलों की कटाई और शिकारियों पर नजर रखने में उपयोगी हो सकते हैं।रिसर्च का मेन फोकस यह पता लगाना है कि पंख फड़फड़ाने वाले ड्रोन कैसे एक्‍सपर्ट्स को वन्यजीवन का अध्ययन करने में मदद कर सकते हैं। हसनालियन ने न्यू साइंस को बताया, ‘कभी-कभी आप नहीं चाहते कि लोगों को पता चले कि यह एक ड्रोन है।’ फाइनल प्रोडक्‍ट को ज्‍यादा से ज्‍यादा वास्तविक बनाने के लिए उन्होंने और उनके न्यू मैक्सिको के टेक सहयोगियों ने पहले से ही आर्टिफिशियल फ्लैपिंग ड्रोन के साथ मर चुके परिंदों के पार्ट्स का इस्‍तेमाल किया हैउन्‍होंने कहा कि वे जानना चाहते हैं कि पक्षी कैसे जानते हैं कि कब घूमना है। अगर वे ड्रोन को अपने कंट्रोल एल्गोरिदम के साथ प्रोग्राम करते हैं, तो उन्‍हें पक्षियों जितना फायदा हो सकता है। फिर ऐसे एल्गोरिदम का इस्‍तेमाल अलग-अलग तरह के ड्रोन के लिए किया जा सकता है।

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